चतुराई धरी रह गई ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश" चतुरसिंह के पिता का देहांत हो चुका था. उस ने अपने छोटे भाई कोमलसिंह को बंटवारा करने के लिए बुलाया , “ बंटवारे के पहले खाना खा लेते है. ” खाने परोसते हुए चतुरसिंह ने कोमलसिंह से कहा. कोमलसिंह ने जवाब दिया , “ भैया ! बंटवारा आप ही कर लेते. मुझे अपना हिस्सा दे देते.बाकि आप रख लेते. मुझे बुलाने की क्या जरुरत थी ?” “ नहीं भाई. मै यह सुनना बरदाश्त नहीं कर सकता हूँ कि बड़े भाई ने छोटे भाई का हिस्सा मार लिया ,” कहते हुए चतुरसिंह ने भोजन की दो थाली परोस कर सामने रख दी. एक थाली में मिठाई ज्यादा थी. इस वजह से वह थाली खालीखाली नजर आ रही थी. दूसरी थाली में पापड़ , चावल , भुजिए ज्यादा थे. वह ज्यादा भरी हुई नज़र आ रही थी. मिठाई वाली थाली में दूधपाक , मलाईबरफी व अन्य कीमती मिठाइयाँ रखी थी. “ जैसा भी खाना चाहो , वैसी थाली उठा लो ,” चतुरसिंह ने कहा , वह यह जानना चाहता था कि बंटवारे के समय कोमलसिंह ...
Comments
Post a Comment